भारत में अंग्रेजों का आगमन और Company Rule || East India Company in India

भारत में अंग्रेजों का आगमन और Company Rule ||East India Company in India

East India Company का भारत में आगमन: जब व्यापारी बनकर आए अंग्रेज और धीरे-धीरे सत्ता के मालिक बन गए

AAIYE……एक कहानी से शुरुआत करते हैं…

कल्पना कीजिए…

Table of Contents

आज से लगभग 400 साल पहले का भारत।

न कोई मोबाइल था, न इंटरनेट, न हवाई जहाज और न ही ऐसी तेज रेलगाड़ियाँ, जो कुछ घंटों में एक शहर से दूसरे शहर पहुँचा दें।

लेकिन भारत तब भी दुनिया के सबसे अमीर और आकर्षक देशों में गिना जाता था।

भारत के बाजारों में मसाले, कपड़े, रेशम, नील, चाय, कीमती पत्थर और दूसरी बहुमूल्य वस्तुएँ मिलती थीं। खासकर भारत का कपड़ा यूरोप में बहुत पसंद किया जाता था।

यूरोप के व्यापारी भारत से सामान खरीदने के लिए समुद्र पार करके हजारों किलोमीटर की यात्रा करने को तैयार थे।

और इन्हीं व्यापारियों के बीच एक कंपनी थी—

East India Company.

शुरुआत में इसका सपना भारत पर राज करना नहीं था।

उसका लक्ष्य बहुत सीधा था—

भारत से सामान खरीदो, यूरोप में बेचो और खूब पैसा कमाओ।

लेकिन इतिहास में कई बार सबसे बड़ी घटनाएँ छोटे-से उद्देश्य से शुरू होती हैं।

East India Company भी भारत में व्यापार करने आई थी।

उसे शायद उस समय यह अंदाजा भी नहीं था कि आने वाले लगभग दो सौ वर्षों में यही कंपनी भारत के विशाल हिस्से की राजनीतिक शक्ति बन जाएगी।

और यही इस कहानी का सबसे दिलचस्प हिस्सा है—

एक कंपनी, जो व्यापार करने आई थी, आखिर एक देश की सत्ता तक कैसे पहुँच गई?

आइए Ab कहानी को बिल्कुल शुरुआत से समझते हैं।

 

भारत में अंग्रेजों का आगमन और Company Rule
भारत में अंग्रेजों का आगमन और Company Rule

1. East India Company क्या थी?

सबसे पहले एक बहुत आसान बात समझिए।

East India Company कोई देश नहीं थी।

यह एक व्यापारिक कंपनी थी।

आज जैसे कोई बड़ी कंपनी मोबाइल, कपड़े, कार या ऑनलाइन सामान बेचकर पैसा कमाती है, उसी तरह East India Company का मूल उद्देश्य भी व्यापार से लाभ कमाना था।

लेकिन उस समय की दुनिया आज जैसी नहीं थी।

यूरोप के देशों में एशिया के साथ व्यापार को लेकर जबरदस्त प्रतिस्पर्धा थी।

भारत, दक्षिण-पूर्व एशिया और दूसरे एशियाई क्षेत्रों के मसाले, कपड़े और अन्य वस्तुएँ यूरोप में बहुत महँगी कीमत पर बिकती थीं।

इसलिए यूरोप के व्यापारी भारत तक सीधे पहुँचने का रास्ता तलाश रहे थे।

इसी व्यापारिक दौड़ में अंग्रेज भी पीछे नहीं रहना चाहते थे।

और फिर आया—

साल 1600

31 दिसंबर 1600 को इंग्लैंड की महारानी Elizabeth I ने एक व्यापारिक संस्था को शाही अनुमति यानी Royal Charter प्रदान किया।

इस संस्था का नाम था—

Governor and Company of Merchants of London Trading into the East Indies.

इसी संस्था को आगे चलकर सामान्य रूप से East India Company कहा गया।

अब एक सवाल पैदा होता है—

महारानी ने कंपनी को इतनी बड़ी अनुमति क्यों दी?

क्योंकि इससे इंग्लैंड को भी एशिया के साथ व्यापार करने का अवसर मिलता था।

यानी कंपनी का जन्म मूल रूप से व्यापारिक उद्देश्य से हुआ था।

इसे पूर्वी देशों के साथ व्यापार करने के लिए विशेष अधिकार दिए गए।

यहाँ एक बात CLAT और अन्य परीक्षाओं के लिए याद रखने लायक है:

1600 — East India Company की स्थापना/चार्टर।

इसे भारत में अंग्रेजी शासन की शुरुआत समझ लेना सही नहीं होगा।

क्यों?

क्योंकि 1600 में कंपनी बनी थी, लेकिन भारत में अंग्रेजों को राजनीतिक सत्ता हासिल करने में अभी बहुत लंबा समय लगना था।

यही फर्क समझना बहुत जरूरी है।


2. भारत ही क्यों?

अब सोचिए—

अगर कोई व्यापारी हजारों किलोमीटर समुद्र पार करके किसी देश में जाना चाहे, तो उसके पीछे कोई बड़ा फायदा जरूर होगा।

तो अंग्रेज भारत की ओर क्यों आकर्षित हुए?

इसका सबसे आसान जवाब है—

भारत का धन और व्यापार।

उस समय भारत दुनिया के महत्वपूर्ण व्यापारिक क्षेत्रों में से एक था।

भारतीय वस्त्रों की विदेशों में बहुत माँग थी।

सूती कपड़े, रेशमी कपड़े, मसाले, नील और दूसरी वस्तुएँ विदेशी व्यापारियों को आकर्षित करती थीं।

यूरोप में भारतीय कपड़ों की लोकप्रियता इतनी अधिक थी कि भारत के वस्त्र यूरोपीय बाजार में बड़ी मात्रा में बिकते थे।

अब इसे एक छोटे उदाहरण से समझिए।

मान लीजिए किसी भारतीय व्यापारी के पास एक ऐसा कपड़ा है जिसे उसके शहर में ₹100 में खरीदा जा सकता है, लेकिन विदेश के बाजार में वही कपड़ा बहुत ज्यादा कीमत में बिक सकता है।

तो विदेशी व्यापारी क्या करेगा?

वह भारत से सीधे वह कपड़ा खरीदेगा और अपने देश में जाकर ऊँची कीमत पर बेचेगा।

यही उस समय के समुद्री व्यापार का बड़ा आकर्षण था।

जहाँ बड़ा बाजार होता है, वहाँ व्यापारी पहुँचते हैं।

और भारत उस समय ऐसा ही एक बड़ा बाजार था।


3. अंग्रेजों के भारत आने का असली उद्देश्य क्या था?

जब अंग्रेज पहली बार भारत आए तो उनके मन में मुख्य उद्देश्य राज करना नहीं, व्यापार करना था।

उनका उद्देश्य था—

  • भारतीय वस्तुएँ खरीदना
  • उन्हें यूरोप में बेचना
  • व्यापार से लाभ कमाना
  • भारत में व्यापारिक केंद्र स्थापित करना
  • समुद्री व्यापार के रास्तों पर अपनी पकड़ मजबूत करना

यानी शुरुआत में उनका परिचय था—

व्यापारी के रूप में।

यह बात बहुत महत्वपूर्ण है।

क्योंकि अगर हम शुरुआत में ही यह मान लें कि अंग्रेज भारत में आते ही भारत पर कब्जा करने आए थे, तो पूरी कहानी को समझने में गलती होगी।

असल कहानी कहीं ज्यादा दिलचस्प है।

पहले व्यापार आया, फिर व्यापार की सुरक्षा की जरूरत आई, फिर सैनिक आए, फिर राजनीति में दखल शुरू हुआ और अंत में सत्ता हाथ में आ गई।

यही धीरे-धीरे हुआ।


4. भारत में अंग्रेजों की शुरुआती गतिविधियाँ

East India Company के सामने सबसे बड़ी चुनौती थी—

भारत तक पहुँचना और यहाँ व्यापार करने की अनुमति प्राप्त करना।

उस समय भारत कोई खाली जमीन नहीं था।

यहाँ शक्तिशाली शासक, स्थानीय राज्य, व्यापारी और पहले से मौजूद विदेशी व्यापारी भी थे।

अंग्रेजों से पहले पुर्तगाली और डच जैसे यूरोपीय व्यापारी भी भारत के समुद्री व्यापार में सक्रिय थे।

इसलिए अंग्रेजों को सिर्फ समुद्र पार करके भारत आ जाना काफी नहीं था।

उन्हें यहाँ अपने लिए जगह बनानी थी।

वे भारत के शासकों से व्यापार की अनुमति माँगने लगे।

जहाँ अनुमति मिलती, वहाँ वे अपना व्यापारिक केंद्र यानी Factory स्थापित करने का प्रयास करते।

अब यहाँ एक शब्द को लेकर अक्सर छात्रों को भ्रम होता है।

Factory का मतलब क्या था?

आज हम Factory सुनते ही मशीनों वाली बड़ी औद्योगिक इमारत सोचते हैं।

लेकिन उस समय कंपनी की भाषा में Factory का अर्थ मुख्य रूप से व्यापारिक केंद्र या व्यापारिक प्रतिष्ठान था।

यहाँ कंपनी के कर्मचारी रहते थे, सामान रखा जाता था, खरीद-बिक्री होती थी और व्यापार से जुड़े काम किए जाते थे।

यानी शुरुआती अंग्रेजी Factory को आज की किसी बड़ी manufacturing factory से जोड़कर नहीं देखना चाहिए।


5. सूरत: भारत में अंग्रेजी व्यापार का महत्वपूर्ण शुरुआती पड़ाव

अब कहानी पहुँचती है पश्चिमी भारत की ओर।

सूरत।

सूरत उस समय एक महत्वपूर्ण बंदरगाह और व्यापारिक केंद्र था।

विदेशों से आने वाले जहाज यहाँ पहुँचते थे और समुद्री व्यापार के लिए यह जगह बेहद महत्वपूर्ण थी।

East India Company ने भारत में अपना व्यापार जमाने के लिए सूरत पर विशेष ध्यान दिया।

1613 में सूरत में अंग्रेजों की पहली स्थायी Factory स्थापित हुई।

इसे भारत में अंग्रेजी व्यापार की शुरुआती महत्वपूर्ण उपलब्धियों में माना जाता है।

लेकिन यहाँ भी कहानी सिर्फ अंग्रेजों की इच्छा से नहीं चल रही थी।

उन्हें स्थानीय शासकों से अनुमति और संरक्षण की आवश्यकता थी।

इसी दौरान अंग्रेजों ने मुगल सत्ता के साथ अपने संबंध मजबूत करने का प्रयास किया।


6. मुगल दरबार तक पहुँची अंग्रेजों की बात

उस समय भारत के बड़े हिस्से पर मुगल साम्राज्य का प्रभाव था।

अंग्रेजों के लिए यह बहुत महत्वपूर्ण था।

क्योंकि अगर उन्हें मुगल सत्ता से व्यापार की अनुमति और संरक्षण मिल जाए, तो भारत में उनका व्यापार काफी आसानी से फैल सकता था।

इसीलिए East India Company ने मुगल दरबार से व्यापारिक अधिकार प्राप्त करने की कोशिश की।

1615 में Sir Thomas Roe को इंग्लैंड के राजा James I के राजदूत के रूप में मुगल सम्राट जहाँगीर के दरबार में भेजा गया।

यह घटना अंग्रेजों के लिए महत्वपूर्ण थी।

क्यों?

क्योंकि अब अंग्रेज सिर्फ बंदरगाह पर सामान बेचने वाला छोटा विदेशी व्यापारी नहीं रहना चाहते थे।

वे भारत में अपने व्यापार को कानूनी और सुरक्षित आधार देना चाहते थे।

Thomas Roe ने मुगल दरबार में अंग्रेजी व्यापार के लिए सुविधाएँ प्राप्त करने का प्रयास किया।

यहाँ एक महत्वपूर्ण बात समझिए—

अंग्रेजों की ताकत उस समय इतनी नहीं थी कि वे भारत के शासकों को आदेश दे सकें।

उन्हें अनुमति माँगनी पड़ती थी।

यानी कहानी के इस चरण में शक्ति अभी भारतीय शासकों के हाथ में थी।


7. छोटे व्यापारिक केंद्रों से बढ़ने लगी कंपनी की मौजूदगी

अब धीरे-धीरे East India Company भारत के अलग-अलग हिस्सों में अपने व्यापारिक केंद्र स्थापित करने लगी।

पश्चिम में सूरत, दक्षिण में मद्रास, पूर्व में कलकत्ता और पश्चिम में बाद में बंबई जैसे केंद्र कंपनी के लिए महत्वपूर्ण बने।

इन जगहों ने आगे चलकर अंग्रेजी सत्ता के विस्तार में बहुत बड़ी भूमिका निभाई।

लेकिन ध्यान रखिए—

व्यापारिक केंद्र बनाना और राजनीतिक राजधानी बनाना दो अलग बातें थीं।

शुरुआत में इन स्थानों का उद्देश्य व्यापार था।

कंपनी को यहाँ गोदाम चाहिए थे।

व्यापारियों के रहने की जगह चाहिए थी।

सामान रखने की जगह चाहिए थी।

बंदरगाह चाहिए था।

और सबसे जरूरी—

व्यापार की सुरक्षा चाहिए थी।

लेकिन यहीं से कहानी में एक बहुत बड़ा बदलाव शुरू हुआ।


8. व्यापारी को सुरक्षा के लिए सैनिक क्यों चाहिए थे?

अब इसे एक साधारण उदाहरण से समझिए।

मान लीजिए आपकी एक दुकान है।

आप हर दिन लाखों रुपये का सामान खरीदते और बेचते हैं।

लेकिन आपकी दुकान ऐसी जगह है जहाँ चोरी और लूट का खतरा रहता है।

तो आप क्या करेंगे?

आप सुरक्षा के लिए गार्ड रखेंगे।

East India Company ने भी कुछ ऐसा ही किया।

जैसे-जैसे उसका व्यापार बढ़ा, वैसे-वैसे उसे अपने व्यापारिक केंद्रों और सामान की सुरक्षा की जरूरत महसूस हुई।

कंपनी ने अपने व्यापारिक केंद्रों की रक्षा के लिए सैनिक रखने शुरू किए।

किलेबंदी की।

हथियार जमा किए।

और अपने ठिकानों को मजबूत करना शुरू किया।

यहीं से एक बहुत महत्वपूर्ण परिवर्तन दिखाई देता है।

व्यापारी के हाथ में अब सिर्फ व्यापार का सामान नहीं था—हथियार भी आने लगे थे।

हालाँकि इसका मतलब यह नहीं था कि कंपनी तुरंत भारत पर कब्जा करने लगी।

लेकिन शक्ति की दिशा धीरे-धीरे बदल रही थी।


9. व्यापार और राजनीति के बीच की दीवार धीरे-धीरे टूटने लगी

अब तक कहानी कुछ ऐसी थी—

व्यापारी आया → व्यापार किया → Factory बनाई → सुरक्षा के लिए सैनिक रखे।

लेकिन समस्या तब पैदा होती है जब व्यापारिक हित और राजनीतिक हित एक-दूसरे से जुड़ने लगते हैं।

अगर किसी स्थानीय शासक ने कंपनी को व्यापार करने से रोक दिया तो?

अगर किसी दूसरे यूरोपीय व्यापारी ने कंपनी के व्यापार को नुकसान पहुँचाया तो?

अगर किसी बंदरगाह पर कंपनी के हितों को खतरा हुआ तो?

कंपनी को अपने व्यापार की रक्षा के लिए स्थानीय राजनीति को समझना पड़ा।

और धीरे-धीरे—

व्यापारियों ने राजनीति में रुचि लेना शुरू कर दिया।

यह बदलाव एक दिन में नहीं हुआ।

यह कई दशकों में धीरे-धीरे हुआ।


10. Company से Political Power तक का सफर

अब इस पूरी कहानी को एक लाइन में समझिए।

पहला चरण — व्यापारी

East India Company भारत आई क्योंकि उसे व्यापार करना था।

दूसरा चरण — व्यापारिक केंद्र

उसने अलग-अलग जगहों पर अपने व्यापारिक केंद्र स्थापित किए।

तीसरा चरण — सुरक्षा

व्यापार और माल की सुरक्षा के लिए सैनिक और किलेबंदी की जरूरत बढ़ी।

चौथा चरण — स्थानीय राजनीति में रुचि

अपने व्यापारिक हितों की रक्षा के लिए कंपनी ने स्थानीय शासकों और राजनीतिक परिस्थितियों में हस्तक्षेप करना शुरू किया।

पाँचवाँ चरण — सैन्य शक्ति

कंपनी की सैन्य शक्ति बढ़ती गई।

छठा चरण — राजनीतिक प्रभाव

कंपनी ने धीरे-धीरे राजनीतिक फैसलों को प्रभावित करने की क्षमता हासिल करनी शुरू की।

और आगे चलकर यही कंपनी—

भारत के बड़े हिस्से पर शासन करने वाली शक्ति बन गई।

लेकिन यहाँ एक बहुत बड़ा सवाल है—

आखिर एक व्यापारिक कंपनी इतनी शक्तिशाली कैसे बनी?

इस सवाल का जवाब सिर्फ अंग्रेजों की ताकत में नहीं छिपा है।

इसके पीछे भारत की उस समय की राजनीतिक परिस्थितियाँ भी बहुत महत्वपूर्ण थीं।

मुगल साम्राज्य की शक्ति में धीरे-धीरे कमी आई।

कई क्षेत्रीय शक्तियाँ मजबूत हुईं।

अलग-अलग भारतीय राज्यों के बीच संघर्ष बढ़े।

और कंपनी ने इन राजनीतिक परिस्थितियों का फायदा उठाया।

यानी कंपनी सिर्फ अपनी ताकत से आगे नहीं बढ़ी।

उसने व्यापार, कूटनीति, सैन्य शक्ति और स्थानीय राजनीति—इन सभी का इस्तेमाल किया।


11. सबसे बड़ा सबक: अंग्रेज अचानक शासक नहीं बने

यहाँ थोड़ा रुकिए और पूरी कहानी को पीछे मुड़कर देखिए।

सन 1600 में East India Company की शुरुआत हुई।

उस समय वह सिर्फ एक व्यापारिक संस्था थी।

भारत में आने के बाद उसने व्यापारिक सुविधाएँ प्राप्त कीं।

सूरत जैसे महत्वपूर्ण बंदरगाहों में अपना व्यापार बढ़ाया।

मुगल दरबार से संबंध बनाए।

व्यापारिक केंद्र स्थापित किए।

अपने व्यापार की सुरक्षा के लिए सैनिक रखे।

फिर धीरे-धीरे राजनीतिक परिस्थितियों में हस्तक्षेप बढ़ा।

और आने वाले समय में कंपनी की शक्ति इतनी बढ़ी कि वह भारतीय शासकों को चुनौती देने की स्थिति में पहुँच गई।

यानी अंग्रेजों का भारत में राजनीतिक उदय—

एक झटके में नहीं हुआ।

यह एक लंबी प्रक्रिया थी।

और शायद यही इस पूरे इतिहास की सबसे महत्वपूर्ण बात है।


12. एक छोटी-सी कहानी में पूरा Chapter याद करें

अगर आपको पूरी बात परीक्षा के समय सिर्फ एक कहानी की तरह याद करनी हो, तो इसे ऐसे याद कीजिए—

एक समय की बात है।

इंग्लैंड में कुछ व्यापारी बैठे थे।

उन्हें खबर थी कि पूर्व के देशों में ऐसी बहुमूल्य वस्तुएँ मिलती हैं जिन्हें यूरोप में बहुत महँगी कीमत पर बेचा जा सकता है।

उन्होंने सोचा—

“अगर हम सीधे वहाँ जाकर सामान खरीदें तो बहुत पैसा कमाया जा सकता है।”

31 दिसंबर 1600 को महारानी Elizabeth I ने उन्हें शाही अनुमति दे दी।

जन्म हुआ—

East India Company का।

कंपनी भारत पहुँची।

उसने कहा—

“हमें राजनीति नहीं करनी, हमें सिर्फ व्यापार करना है।”

भारत में उसे व्यापार की अनुमति चाहिए थी।

सूरत जैसे बंदरगाहों में उसने अपना व्यापार बढ़ाया।

मुगल दरबार से संबंध बनाए।

1615 में Thomas Roe जहाँगीर के दरबार में पहुँचे।

धीरे-धीरे कंपनी ने अपने व्यापारिक केंद्र बनाए।

फिर व्यापार की सुरक्षा के लिए सैनिक रखने पड़े।

सैनिक आए तो हथियार आए।

हथियार आए तो किलेबंदी हुई।

किलेबंदी हुई तो कंपनी पहले से ज्यादा शक्तिशाली हो गई।

फिर कंपनी ने महसूस किया—

“अगर भारत की राजनीति हमारे व्यापार को प्रभावित करती है, तो हमें राजनीति में भी अपनी जगह बनानी होगी।”

और यहीं से—

व्यापारी धीरे-धीरे राजनीतिक खिलाड़ी बन गया।

आगे चलकर यही राजनीतिक खिलाड़ी—

शासक बनने की दिशा में बढ़ा।


13. CLAT के लिए Quick Revision

इस पूरे भाग से कुछ facts विशेष रूप से याद रखें:

1600 → East India Company को इंग्लैंड की महारानी Elizabeth I से Royal Charter मिला।

मुख्य उद्देश्य → भारत और पूर्वी देशों के साथ व्यापार करके लाभ कमाना।

भारत आकर्षण का कारण → भारतीय वस्त्र, मसाले, नील और अन्य बहुमूल्य वस्तुओं का व्यापार।

1613 → सूरत में अंग्रेजों की पहली स्थायी Factory स्थापित हुई।

1615 → Sir Thomas Roe को James I के राजदूत के रूप में मुगल सम्राट जहाँगीर के दरबार में भेजा गया।

Factory → उस समय मुख्य रूप से व्यापारिक केंद्र/प्रतिष्ठान, न कि आधुनिक अर्थ वाली उत्पादन फैक्ट्री।

और सबसे महत्वपूर्ण—

East India Company भारत में पहले व्यापारी के रूप में आई थी, लेकिन धीरे-धीरे व्यापारिक शक्ति से राजनीतिक शक्ति बन गई।

यही भारत में अंग्रेजी सत्ता के उदय की शुरुआती कहानी है।

लेकिन कहानी अभी खत्म नहीं हुई है।

असल मोड़ तो तब आएगा जब कंपनी केवल व्यापार से संतुष्ट नहीं रहेगी और भारत की राजनीति में सीधे उतरने लगेगी।

फिर आएँगे—

Carnatic Wars, Plassey, Buxar, Bengal और Company Rule का असली विस्तार।

और तब हमें समझ आएगा कि—

“एक कंपनी ने आखिर भारत जैसे विशाल देश की सत्ता अपने हाथ में कैसे ले ली?”

यही इस कहानी का अगला अध्याय होगा।

 

❓ Frequently Asked Questions

1. East India Company भारत में कब आई?

East India Company को 31 दिसंबर 1600 को Royal Charter मिला और इसके बाद उसने भारत में व्यापार शुरू किया। 1613 में सूरत में पहली स्थायी Factory स्थापित हुई।

2. East India Company भारत में क्यों आई थी?

यह भारत में मुख्य रूप से व्यापार और लाभ कमाने के लिए आई थी। भारतीय कपड़े, मसाले, नील और रेशम की यूरोप में काफी मांग थी।

3. अंग्रेज भारत में सबसे पहले कहाँ आए थे?

अंग्रेजों ने भारत में अपने शुरुआती व्यापारिक प्रयास सूरत जैसे प्रमुख बंदरगाहों से शुरू किए। सूरत बाद में उनका महत्वपूर्ण व्यापारिक केंद्र बना।

4. भारत में अंग्रेजों की पहली Factory कहाँ थी?

East India Company की पहली स्थायी अंग्रेजी Factory सूरत में 1613 में स्थापित हुई थी।

5. East India Company की स्थापना किसने की थी?

East India Company अंग्रेज व्यापारियों द्वारा बनाई गई थी और इसे 1600 में Elizabeth I का Royal Charter मिला था।

6. East India Company को Royal Charter किसने दिया था?

महारानी Elizabeth I ने 31 दिसंबर 1600 को East India Company को Royal Charter दिया था।

7. Thomas Roe भारत क्यों आया था?

Thomas Roe 1615 में व्यापारिक सुविधाएँ प्राप्त करने और मुगल दरबार से East India Company के लिए व्यापारिक अधिकार लेने आया था।

8. Thomas Roe किस मुगल शासक के दरबार में गया था?

Thomas Roe मुगल सम्राट जहाँगीर के दरबार में 1615 में गया था।

9. East India Company व्यापारी से शासक कैसे बनी?

व्यापार से शुरू होकर कंपनी ने सैनिक शक्ति और राजनीतिक हस्तक्षेप बढ़ाया। प्लासी (1757) और बक्सर (1764) के बाद उसकी सत्ता मजबूत हुई।

10. Company Rule और British Rule में क्या अंतर है?

Company Rule में East India Company का शासन था, जबकि British Rule में सीधे ब्रिटिश Crown का शासन था। Crown Rule 1858 में शुरू हुआ।

11. भारत में अंग्रेजी शासन कब शुरू हुआ?

1757 के प्लासी युद्ध के बाद भारत में अंग्रेजों की राजनीतिक शक्ति तेजी से बढ़ने लगी। 1765 के दीवानी अधिकारों ने इसे और मजबूत किया।

12. East India Company का मुख्य उद्देश्य क्या था?

East India Company का शुरुआती मुख्य उद्देश्य व्यापार करके लाभ कमाना था, न कि भारत पर शासन करना।

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